Thursday, July 3, 2025

व्यापार नहीं, जनता की भलाई ज़रूरी है



"अगर कोई गाड़ी फिट है, तो उसे सड़कों पर चलने से क्यों रोका जाना चाहिए?"

एक आम नागरिक अपनी गाढ़ी कमाई से 15 लाख रुपये की गाड़ी खरीदता है, उस पर लोन चुकाता है, हर साल बीमा करवाता है, समय-समय पर सर्विस कराता है, ईंधन भरवाता है, टोल टैक्स और अन्य सरकारी टैक्स देता है। अंततः यह गाड़ी उसे जीवनभर में 25 से 30 लाख रुपये की पड़ती है। और फिर अचानक सरकार कहती है — अब आप इसे नहीं चला सकते!

तो उस नागरिक को क्या मिलता है? "नील बट्टे सन्नाटा!"

अगर गाड़ी सड़क योग्य है, प्रदूषण मानकों पर खरी उतरती है, तो उसे सिर्फ 10 या 15 साल पुरानी होने की वजह से स्क्रैप में डालना जनता को जबरन आर्थिक बोझ में धकेलना है और गाड़ी निर्माता कंपनियों को फायदा पहुंचाना है।

सरकारें चाहे "ऑड-ईवन" लागू करने वाली हों या उसका विरोध करने वाली, दोनों ही बड़े लोगों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं। लेकिन एक मध्यम वर्गीय नागरिक, जो अपनी जिंदगी की बड़ी कमाई एक गाड़ी में लगाता है, उसके लिए यह सिर्फ एक "सवारी" नहीं, बल्कि "जीवनभर का निवेश" होता है।

सरकारी विभाग खुद 20-25 साल पुरानी गाड़ियां चलाते हैं, लेकिन जनता को 10-15 साल बाद गाड़ी बंद करने का आदेश देते हैं। यह दोहरी नीति है।

इस देश में गरीबों को मुफ्त योजनाएं, अमीरों को अरबों के कर्ज माफ, और मिडिल क्लास? उसे हर मोर्चे पर "निचोड़ा" जाता है — टैक्स, लोन, और अब स्क्रैप नीति।

सरकार को चाहिए:

  1. गाड़ी निर्माता कंपनियों पर दबाव बनाए कि वे अधिक टिकाऊ और कम प्रदूषणकारी गाड़ियां बनाएं।
  2. हर शहर में पारदर्शी प्रदूषण परीक्षण केंद्र बनाए जाएं।
  3. जो गाड़ियां फिट हैं, उन्हें स्क्रैप घोषित न किया जाए।
  4. पब्लिक ट्रांसपोर्ट की गुणवत्ता सुधारी जाए — ताकि लोग निजी गाड़ी खरीदने को मजबूर न हों।
  5. कारखानों पर सख्ती से नकेल कसी जाए, जो बड़े स्तर पर प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं।
  6. पर्यावरण के लिए काम हो — पेड़ लगाए जाएं, सस्टेनेबल टेक्नोलॉजी लाई जाए।

कोई आम आदमी गाड़ी सिर्फ शौक़ के लिए नहीं खरीदता — मजबूरी, ज़रूरत और असुरक्षित सार्वजनिक परिवहन उसे ऐसा करने पर मजबूर करता है।

यह नियम व्यापार चलाने के लिए नहीं, देश चलाने के लिए होने चाहिए।

सादर,
एक जिम्मेदार नागरिक








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